इत्तेफ़ाक ऐ मुलाकात 🤝
वो मिले भी तो चंद कुछ मिनटों के लिए और वो समय मेरे लिए बहुत ही प्रभावशाली रहा । मुझे उस वक्त कुछ समझने तक का मौका नहीं मिला , और चीजें इतना जल्दी हुईं कि , हम एक दूसरे को देखते रह गए , फिर ऐसा करते करते कुछ ही समय बाद वो भी मेरी आंखों से धीरे धीरे ओझल हो गए ।
मैं उनको देखकर बिलकुल शांत हो गया । फिर कुछ समय तक वहीं ठहरा रहा । मैं यह सोचने लगा कि अखिरखार इत्तेफ़ाक ही सही उनसे मुलाकात तो हुई । वो जाते जाते सिर्फ़ यही कह के गए कि पहले आप बोले क्यों नहीं । अब ये सब इतना जल्दी हुआ कि हम उनके प्रश्नों का उत्तर देने में बिलकुल असमर्थ हो गए ? लेकिन फिर हम बोले की कहां जा रहे हो । सिर्फ़ इतना ही बोलने के बाद वो बोलते हैं की अच्छा चलते हैं । शायद उनका कुछ काम था फिर वो वहां से चले गए और बोले कि फिर मिलते हैं । ख़ैर मेरे जहन में भी काफ़ी सवाल थे जैसे की इतने दिनों के बीच मेरी याद आई की नहीं और बहुत कुछ लेकिन कुछ ही समय बाद हम लोगों को वहां से जाना पड़ा । इस छोटी सी मुलाकात का अंतराल लगभग दो सालों का था । कभी कभी कुछ मुलाकातें भले ही छोटी होती हैं लेकिन पता नहीं क्यों यादें बहुत एकत्रित हो जाती हैं हमेशा के लिए ?
उनसे मिलकर लौटता हुआ कदम कितना भारी हो जाता है कि , उठाए नहीं उठता ...
घसीटना पड़ता है उन दो पैरों पर आश्रित जिस्म के बोझ को ...?
लगाव का मोह इतना दुखदाई क्यों होता है कि , एक जीता जागता इंसान निर्जीव हो जाता है ....
क्यों ऐसे लोग मिलते हैं , जो मिलकर भी नहीं मिलते हैं....?
शेष अगले अंक में...✍️
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