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तुम लौट आओगे शायद...!

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                       रेलवे स्टेशन, बस अड्डा, और कई अनगिनत चौराहे रहे होंगे चश्मदीद गवाह, बिछड़ने की घड़ी का, हालाँकि वास्तव में अलग होने से पहले, कई दिन तक दो लोगों ने लगातार महसूस किया होगा, बिछड़ना| विरह, वियोग, हिज्र की तीव्रता को अपने-अपने हिसाब से महसूस किया होगा जैसे कि मैं आजतक उन बीती स्मृतियों के बारे में महसूस कर रहा हूँ|  तुम्हारा जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी पर मेरे जीवन की वह घटना थी जिसको मैंने कभी नहीं सोचा था| (कुछ घटनायें यथार्थ के एकदम क़रीब होती है पर हम उसे अपनी कल्पना में भी अपने आसपास नहीं भटकने देते है|) नियति ने तय किया होगा तुम्हारा जाना लेकिन मैं नियति में विश्वास नहीं रखता था | मुझे लगता था चीज़ें हमारे अनुसार होती हैं हमारे भले के लिए| पर तुम्हारे जाने में मेरा क्या भला रहा होगा? आज तुम्हें गए हुए सालों हो चुकें हैं पर तुम्हारी जाने की स्मृति इतनी ताज़ी है कि लगता है कल ही इस स्मृति ने जन्म लिया था| (समय के साथ हम बूढ़े हो जाते है लेकिन कुछ स्मृतियाँ समय के साथ और जवान हो जाती है|) तुम्ह...

प्रेम और साहित्य ❤️

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  मेरा मानना है कि प्रेम कभी बांधता नहीं है वो मुक्त करता है । आप अपने प्रति स्वतंत्र हैं निर्णय लेने को , प्रेम की भाषा ही अलग है । आप अपने दैनिक जीवन के आयामों से नहीं समझ सकते हैं , उसे समझने के लिए आप भावनात्मक , सहानुभूति , सामर्थ , संवेदनशीलता से पूर्ण रूप से परिपक्व हों , तब आप प्रेम की भाषा को समझ पाएंगे । अब हम आते हैं प्रेम को साहित्य से संबंध को समझने में ...                   प्रेम और साहित्य का संबंध अत्यंत गहरा और अभिन्न है। साहित्य में प्रेम का चित्रण न केवल व्यक्तिगत भावनाओं और रिश्तों की अभिव्यक्ति करता है, बल्कि यह मानवता के व्यापक अनुभवों को भी उजागर करता है। प्रेम साहित्य को गहराई, विविधता और संवेदनशीलता प्रदान करता है, जिससे यह विभिन्न सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भों में भी प्रासंगिक बना रहता है।                   प्रेम केवल एक भावना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव है जो जीवन को पूर्णता और अर्थ प्रदान करता है। प्रेम का मूल स्वरूप निस्वार्थता, समर्पण, और सहानुभू...

इत्तेफ़ाक ऐ मुलाकात 🤝

                                                  वो मिले भी तो चंद कुछ मिनटों के लिए और वो समय मेरे लिए बहुत ही प्रभावशाली रहा । मुझे उस वक्त कुछ समझने तक का मौका नहीं मिला , और चीजें इतना जल्दी हुईं कि , हम एक दूसरे को देखते रह गए , फिर ऐसा करते करते कुछ ही समय बाद वो भी मेरी आंखों से धीरे धीरे ओझल हो गए ।                                             मैं उनको देखकर बिलकुल शांत हो गया । फिर कुछ समय तक वहीं ठहरा रहा । मैं यह सोचने लगा कि अखिरखार इत्तेफ़ाक ही सही उनसे मुलाकात तो हुई । वो जाते जाते सिर्फ़ यही कह के गए कि पहले आप बोले क्यों नहीं । अब ये सब इतना जल्दी हुआ कि हम उनके प्रश्नों का उत्तर देने में बिलकुल असमर्थ हो गए ? लेकिन फिर हम बोले की कहां जा रहे हो । सिर्फ़ इतना ही बोलने के बाद वो बोलते हैं की अच्छा चलते हैं । शायद उनका कुछ काम था फिर वो...

सबके हिस्से में नहीं आता !

ये ज़मीं , ये आसमान  ये खुशी , ये मुस्कान  रोटी , कपड़ा और मकान  सबके हिस्से में नहीं आता । ये ऐतबार , ये प्यार  ये आंसू , ये इंतज़ार  सुकून भरा एक इतवार  सबके हिस्से में नहीं आता । ये मंज़िल ये रास्ता , ये सफ़र  ये रात , ये शाम , ये शहर  हाथ पकड़ के चले , वो हमसफर  सबके हिस्से में नहीं आता । बेसक ये किसी कहानी  किसी किस्से में नहीं आता , के ज़िंदगी मिलती है , मगर जीना  सबके हिस्से में नहीं आता । ~अनिल कुमार ✍️