~ तुम रुक किधर गए ~
हमने तो हाथ भी पकड़े थे छूट कैसे गए ?
कह रहे थे तुम्हें हमसा कोई नहीं मिला
तुम लौट रहे थे , फिर उनके बुलाने पर रुक क्यों गए ?
हम तो सायं से ही समझाने लगे थे अपने रिश्ते को
तुम सुन रहे थे , फिर गहरी नींद से उठ कैसे गए ?
अरे अरे तुम सुनो तो ! ख़्वाब जो तुम देख रहे थे
कुछ पूरे हुए भी ? या सारे ही टूट गए ?
याद है ! वक्त की रेल में तुम थोड़ी देर से चढ़े
हम उसी डिब्बे में रहे और तुम उतर भी गए ?
अब क्या अब बस लिख रहा हूं ! कलम थकी नहीं है
तुम बताओ कभी पढ़ते भी हो , या भूल गए ?
अरे... बहुत दूर निकल आए हम चलते चलते !
रुको वापस आता हूँ , मगर तुम बताओ ?
हम सच में आज निकल आए , या तुम वहीं रुक गए
अरे ! तुम तो साथ ही थे , रुक किधर गए ?
~ अनिल
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