दूरियों का एहसास ❣️🙁


हमारी कहानी कुछ ऐसे शुरू हुई कि शायद हम तुम्हारे यहां ना आते  ना ही हमको पता चल पाता की मेरे ही ख्वाबों में वो भी उलझी रहती है । पहले दिन जब वहां पहुंचा तो अपने अंदर छुपे थोड़ा अकेलेपन के बारे में सोच रहा था । तो कुछ दिन बाद बस हुआ यूं की उनकी नजर भी थोड़े समय के लिए मेरे पर आ रुकी और देखते ही उनके मन कुछ चल रहा था तो बोलने की कोशिश कर रहे थे फिर कुछ देर वो मेरे आंखों से ओझल हो गई और ओझल होने का कारण भी था कि वह अपने दर्द को छुपाने के लिए वो हमारे सामने आने के लिए थोड़ा सा शर्म महसूस कर रही थी तो इसलिए वो कुछ दिन मेरे सामने आने के लिए परेशान थी लेकिन वो अपने घर से थोड़ा सा दबाव महसूस कर रहे थे इसलिए वो सामने नहीं आ पा रहे थे । इससे पहले मेरी नजर उन पर पड़ी भी नहीं थी ये सवाल उनके भी दिमाक में चल रहा था कि हम क्यूं ना उनके सामने जाएं और अपने आप। में अकेलेपन कि जो कमी महसूस हो रही थी तो क्यूं ना दूर करें । फिर एक दिन सुबह मेरी नजर खुली और हम घर कि तरफ जाने कि कोशिश कर रहे थे फिर जब गए तो वो अपने घर का दरवाजा खोल के बाहर धूप लेते हुए बैठी हुई थी फिर जब हम इधर से गए तो मेरी नजर उनपे पड़ी तो हमारी सांसे थोड़ा थम सी गई फिर मेरे मन में ये सवाल उठा रहा था कि शायद ये वक्त थोड़ा सा थम जाता तो हम अपनी बातों को यूं तक बोलने कि कोशिश करते और अपनी यादों को मिटाने को कोशिश करते लेकिन ये होना कहां था फ़िर मेरे सामने से कोई आ रहा था तो हमारी नजर उनके नजरों से दूर हुई और हम फिर अपने घर साइड चले गए । 
                     ये है कि जब से उनको देखा तो मेरे मन में अजीब प्रकार का फील हो रहा था मानो ऐसा लग रहा था कि मेरी सारी पर्शनियों का इलाज मिल गया हो लेकिन फिर भी मेरी निगाहें बस उसके है चाहते को खोजती रहती थी शायद उनसे मेरी नजर ना मिलती तो शायद ये नहीं होता लेकिन। ये वक्त का खेल है जो होना था वो होगा ही । फ़िर कुछ दिनों से मेरी ये हालत हो गई थी कि हम अगर एक घंटे के लिए भी अगर उनको अपने आंखों से दूर होना नहीं अच्छा लग रहा था । और शायद यही प्रॉब्लम से वो भी जूझ रहे थे यहां तक कि रात को अगर नीद में भी रहते तो कई बार अचानक नीद खुलती और हम उनके ख्वाबों में खो से जाते थे । लेकिन दो दिनों से वो मेरे सामने आने कि कोशिश कर रहे थे । शायद उनकी तरफ़ देखकर ऐसा फील हो रहा था कि जैसे उनकी सांस मेरी सांसों से जुड़ी हुई हैं और वो ये भी चाहते थे की हम हम लोग एक साथ बैठकर अपनी बातों को एक दूसरे शेयर करें और अपनी प्रॉब्लम्स को साल्व करें लेकिन वो अपने घर के जिम्मेदारियों से परेशान थे पर क्या ये सारे ख़्वाब हम लोग अपने दिल में ही रखे हैं लेकिन जब कभी हम लोग मिलेंगे तो ये सब बातों पर चर्चा करेंगे । 
                        ये करते करते हमको शायद कुछ दिन हो गए थे फिर घर से रोज फोन भी आ रहे थे तो हुआ ये कि उनको जब हम उनको ये बताते कि अब हम घर जाने वाले है तो शायद वो थोड़ा खामोश से हो गए और मेरे से पिछे घूम गए फ़िर वो कुछ देर बाद नम आंखों से मेरे तरफ देखने कि कोशिश कर रहे थे तो उनको ऐसा देखकर मेरी भी आंखें भर सी आईं और फिर हम घर से बाहर निकले तो कुछ समय तक तो मेरी धड़कने रुक सी गई ऐसा लग रहा था कि हम लोग वैसे भी दूरियों से जूझ रहे थे लेकिन ऐसा कहां होना था और वो भी श्याद यही सोच रहे थे कि हम लोग से ही खुदा क्यूं दूरियों का अहसास दिलाता है । फिर जब हम सड़क कि तरफ जाने को चल दिए तो वो मेरे को एक बार देखने को कोशिश कर रहे थे शायद मैं भी यही सोच रहा था। हमारी भी नजर बस उन्हीं को देखने को ढूढ़ रही थी ।

कुछ दिनों का सफर कुछ इस अंदाज से गुजरा मेरा 🙁🙁 
ये दिन और ये बीते हुए लम्हें शायद हमारे रूह से रूबरू करते रहेंगे । और हां तुम्हारी मुस्कुराहट हमेशा हमें मुस्कुराने कि वजह देंगी । और वो तुम्हारा छुप छुप कर देखने का अंदाज हमेशा सताएगा । 

Miss you so much 

 अनिल .........✍️✍️

Comments

  1. आपके लिखने का अंदाज अच्छा लगा..! आप ऐसे ही लिखते रहे और मुस्कुराते रहे ....।🥰🥀😙

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

तुम लौट आओगे शायद...!

मुलाकात 🤝

सबके हिस्से में नहीं आता !