सबके हिस्से में नहीं आता !
ये ज़मीं , ये आसमान ये खुशी , ये मुस्कान रोटी , कपड़ा और मकान सबके हिस्से में नहीं आता । ये ऐतबार , ये प्यार ये आंसू , ये इंतज़ार सुकून भरा एक इतवार सबके हिस्से में नहीं आता । ये मंज़िल ये रास्ता , ये सफ़र ये रात , ये शाम , ये शहर हाथ पकड़ के चले , वो हमसफर सबके हिस्से में नहीं आता । बेसक ये किसी कहानी किसी किस्से में नहीं आता , के ज़िंदगी मिलती है , मगर जीना सबके हिस्से में नहीं आता । ~अनिल कुमार ✍️